सेवा-कार्य में बीता एक जीवन, जिसकी गवाही अनंत काल तक बनी रहेगी

सेवा-कार्य में बीता एक जीवन, जिसकी गवाही अनंत काल तक बनी रहेगी

जयन के. थॉमस, मुंबई

कुछ मृत्यु केवल आँखों में आँसू ही नहीं लातीं, बल्कि अंतरात्मा को भी झकझोर देती हैं। कुछ मृत्यु केवल एक परिवार के शोक तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरी एक पीढ़ी के लिए आत्मचिंतन का संदेश बन जाती हैं। हाल ही में युवा सुसमाचार प्रचारक पास्टर प्रत्याश कुंजुमोन का असमय प्रभु के पास बुला लिया जाना ऐसी ही एक घटना है।

मैंने यूट्यूब पर उनके अंतिम संस्कार की सभा देखी। वहाँ अनेक लोगों की आँखों में आँसू थे, पर उनसे कहीं अधिक मैंने मसीह में जीवित आशा की गवाही देखी। प्रत्याश, बाइबिल सेमिनरी में मेरे प्रिय मित्र पास्टर मैथ्यू जॉर्ज मन्निल के सहपाठी थे। इसलिए यह समाचार मेरे लिए केवल एक मृत्यु का समाचार नहीं था, बल्कि जीवन के वास्तविक अर्थ पर मनन करने का एक मौन निमंत्रण बन गया।

सिर्फ अट्ठाईस वर्ष की आयु। संसार की दृष्टि में एक ऐसा जीवन, जिसे अभी बहुत लंबी यात्रा तय करनी थी। किंतु परमेश्वर की दृष्टि में वे ऐसे सेवक थे, जिन्होंने उन्हें सौंपे गए कार्य को निर्धारित समय में पूरी निष्ठा के साथ पूरा किया। उन्होंने कोल्लम जिले के एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में कलीसिया की सेवा का नेतृत्व किया, एक नए चर्च भवन के निर्माण को पूर्ण कराया और संगीत सेवा तथा सुसमाचार सभाओं के माध्यम से अनेक लोगों तक मसीह का प्रेम पहुँचाया। उन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण अनंतकाल के उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया।

अंतिम संस्कार की सभा में जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह उनके माता-पिता की गवाही थी। पुत्र-वियोग से जिन हृदयों का टूट जाना स्वाभाविक था, उनमें भी विश्वास की ज्योति बुझी नहीं थी। आँसू थे, पर निराशा नहीं थी। पीड़ा थी, पर विश्वास डगमगाया नहीं था।

उनकी माता ने एक घटना सुनाई, जिसने मेरे मन को गहराई से स्पर्श किया। एक दिन प्रत्याश ने उनसे कहा था, “माँ, रोइए मत। हमारे पास एक जीवित आशा है।” कितना गहन और अर्थपूर्ण संदेश! आज भले ही वह पुत्र इस संसार में नहीं है, पर उसके ये शब्द स्वयं परमेश्वर की ओर से मिली सांत्वना बनकर माँ के आँसू पोंछते प्रतीत होते हैं। कितना अद्भुत ईश्वरीय संयोग है कि ‘प्रत्याश’, जिसका अर्थ ही आशा है, अपने जीवन के साथ-साथ अपने प्रस्थान के बाद भी अपने परिवार और कलीसिया के लिए आशा की विरासत छोड़ गया।

उनके पिता की गवाही भी अत्यंत मार्मिक थी। उनका सपना था कि उनका पुत्र उच्च शिक्षा प्राप्त करे और एक प्रतिष्ठित अधिकारी बने। किंतु एक दिन प्रत्याश ने शांत स्वर में कहा, “पिताजी, मुझे नौकरी नहीं करनी; मैं प्रभु की सेवा करना चाहता हूँ।” उस क्षण एक पिता के सपनों और परमेश्वर की बुलाहट का सामना हुआ, और अंततः परमेश्वर की इच्छा ही पूरी हुई। संसार की दृष्टि में वे कोई बड़े अधिकारी नहीं बने, परंतु स्वर्ग की दृष्टि में उन्होंने परमेश्वर के एक विश्वासयोग्य सेवक के रूप में अपना जीवन सफलतापूर्वक पूरा किया।

जीवन एक जलती हुई मोमबत्ती के समान है। कुछ मोमबत्तियाँ लंबे समय तक जलती हैं, तो कुछ थोड़े समय के लिए। किंतु महत्त्व इस बात का नहीं कि वे कितनी देर तक जलती हैं, बल्कि इस बात का है कि उन्होंने कितने अंधकार को प्रकाश में बदल दिया। किसी फूल की सुंदरता इस बात में नहीं होती कि वह कितने दिनों तक डाली पर टिका रहा, बल्कि इस बात में होती है कि उसने कितनी सुगंध बिखेरी। उसी प्रकार मनुष्य के जीवन का मूल्य उसकी आयु से नहीं, बल्कि इस बात से आँका जाता है कि उसने परमेश्वर और लोगों के जीवन में कितना प्रकाश, प्रेम और आशीष पहुँचाई।

हमारे प्रभु यीशु मसीह की सार्वजनिक सेवा लगभग साढ़े तीन वर्षों तक ही रही। फिर भी उस अल्पकालीन सेवा का प्रभाव आज भी पूरी दुनिया में अनुभव किया जाता है। कलवरी हमें आज भी यही सिखाती है कि जीवन की महानता उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता में है।

प्रेरित पौलुस ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में लिखा था— “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं अपनी दौड़ पूरी कर चुका हूँ, और मैंने विश्वास की रक्षा की है।” (2 तीमुथियुस 4:7)

उन्होंने यह नहीं बताया कि वे कितने वर्ष जीवित रहे; उन्होंने यह बताया कि उन्हें जो जीवन मिला, उसे उन्होंने किस प्रकार जिया। अनंतकाल की दृष्टि में यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

आज हममें से बहुत-से लोग अपना बहुमूल्य समय छोटी-छोटी बहसों, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या और एक-दूसरे की आलोचना में व्यर्थ गँवा देते हैं। परंतु जब हम अनंतकाल के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो ये सब प्रातःकाल की ओस की तरह विलीन हो जाते हैं। इसके विपरीत, परमेश्वर के राज्य के लिए किया गया हमारा प्रत्येक छोटा कार्य भी अनंत मूल्य रखता है।

एक दिन हमारा जीवन भी समाप्त हो जाएगा। हमें यह नहीं मालूम कि कब और कैसे। किंतु तब तक हम कैसे जीते हैं, यह निर्णय हमारा अपना है। आइए, हम प्रत्येक दिन को परमेश्वर द्वारा सौंपे गए एक पवित्र उत्तरदायित्व के रूप में जीएँ, ताकि हमारा जीवन अपने परिवार, कलीसिया और समाज के लिए आशीष तथा सुसमाचार की सजीव गवाही बन सके।

पास्टर प्रत्याश कुंजुमोन का जीवन हमें यह अमूल्य शिक्षा देता है कि महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि परमेश्वर ने हमें कितने वर्ष दिए, बल्कि यह है कि उन्होंने जो वर्ष हमें दिए, उनका हमने कितनी निष्ठा, विश्वासयोग्यता और समर्पण के साथ उपयोग किया।

इतिहास केवल यह दर्ज करेगा कि किसी व्यक्ति का जीवन कितना लंबा था, परंतु अनंतकाल इस बात की गवाही देगा कि उस जीवन का परमेश्वर के लिए कितनी ईमानदारी और विश्वासयोग्यता से उपयोग किया गया।

— हिंदी अनुवाद: जूलिया जयन, मुंबई